रिश्तों की असली खूबसूरती एक-दूसरे को बेहतर इंसान बनाने में है : आलोक श्रीवास्तव
‘लफ़्ज़’ की अदबी शाम में साझा किए साहित्य, जीवन और सृजन के अनुभव
जब शब्दों में अनुभव और संवेदना हो और संवाद में ठहराव और गहराई, तो शाम का यादगार होना स्वाभाविक है। अहमदाबाद में आयोजित ‘लफ़्ज़ — एक अदबी शाम’ में कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला। प्रभा खेतान फाउंडेशन की इस विशेष साहित्यिक संध्या में प्रतिष्ठित कवि, गीतकार और लेखक आलोक श्रीवास्तव ने साहित्य, भाषा, प्रेम, आस्था और अपनी रचनात्मक यात्रा से जुड़े अनुभव साझा किए। उनसे आत्मीय संवाद किया प्रियांशी पटेल, अहसास वूमेन, अहमदाबाद एवं प्रभा खेतान फाउंडेशन की मानद संयोजक (अंतरराष्ट्रीय कार्य) ने।
कार्यक्रम का स्वागत वक्तव्य शेख़ गुलाम फ़रीद ने दिया। उन्होंने प्रभा खेतान फाउंडेशन के कार्यों के बारे में संक्षिप्त जानकारी साझा की। वहीं, समापन वक्तव्य सागर ब्रह्मभट्ट ने प्रस्तुत किया।
संवाद की शुरुआत आलोक श्रीवास्तव की शब्दों से मोहब्बत और उनकी साहित्यिक यात्रा से हुई। उन्होंने अपनी माँ को अपनी पहली साहित्यिक प्रेरणा बताते हुए कहा कि हिंदी-उर्दू की साझा संस्कृति ने उनके लेखन को आकार दिया। उन्होंने स्वयं को न हिंदी का शायर और न उर्दू का कवि, बल्कि “हिंदुस्तानी ज़बान का पोएट” बताया।
उन्होंने कहा कि रिश्तों की असली खूबसूरती एक-दूसरे को बेहतर इंसान बनाने में है। सच्चा रिश्ता वही है, जो व्यक्ति को भीतर से समृद्ध करने में मदद दे। शिव तांडव स्तोत्र के हिंदी भावानुवाद यह केवल साहित्यिक प्रयास नहीं था, बल्कि आस्था और नियति से जुड़ा एक गहरा अनुभव था। उनका मानना है कि जब किसी रचनाकार की साधना पूरी होती है, तो कई बार शब्द स्वयं उसके सामने आकर खड़े हो जाते हैं।
उन्होंने युवाओं को अधिक पढ़ने, अपनी भाषा को समृद्ध करने और अपनी रचनाओं को निरंतर परिष्कृत करने की सलाह दी। अपनी रचनात्मक प्रक्रिया का सूत्र बताते हुए उन्होंने कहा—“95 प्रतिशत पढ़िए और 5 प्रतिशत गढ़िए।”
प्रश्नोत्तर सत्र में उन्होंने कहा कि लेखक के लिए ईमानदारी, अध्ययन और निरंतर अभ्यास ही उसकी वास्तविक पूँजी हैं। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि आलोक श्रीवास्तव को प्रियांशी पटेल ने कांथा दुपट्टा ओढ़ाकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का समापन लेखक के साथ आत्मीय पुस्तक हस्ताक्षर सत्र के साथ हुआ।
प्रभा खेतान फाउंडेशन की अहसास वूमेन, अहमदाबाद द्वारा आयोजित इस विशेष कार्यक्रम को रेख़्ता फ़ाउंडेशन का सहयोग प्राप्त हुआ। आयोजन में सहयोगी कर्मा फ़ाउंडेशन तथा आतिथ्य सहयोगी द हाउस ऑफ़ एम.जी. की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
लेखक के लिए ईमानदारी, अध्ययन और निरंतर अभ्यास ही उसकी वास्तविक पूँजी हैं।














